Thursday, January 31, 2019

'जब गोडसे ने गांधीजी पर दागी थी तीसरी गोली'

30 जनवरी, 1948 को दिल्ली में सूरज नहीं निकला था. कोहरे और जाड़े के कारण सड़कों पर दिल्लीवाले ज़्यादा नहीं निकले थे. मैं हर रोज की तरह आकाशवाणी भवन से अलबुकर्क रोड (अब तीस जनवरी मार्ग) पर स्थित बिड़ला हाउस (अब गांधी स्मृति) के लिए निकला.
वक्त रहा होगा दिन के साढ़े तीन बजे. मैं महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा की रिकॉर्डिंग के लिए जाता था. सभा शाम पांच से छह बजे तक चलती थी. इसमें सर्वधर्म प्रार्थना होती थी.
सभा के अंतिम क्षणों में गांधी सामयिक विषयों पर टिप्पणी करते थे. सभा में आने वाले लोग उनसे बीच-बीच में प्रश्न भी करते थे. बिड़ला हाउस में प्रार्थना सभा का सिलसिला सितम्बर,1947 से शुरू हुआ था.
मैं प्रार्थना सभा की रिकॉर्डिंग को बाद में दफ्तर में दे देता था. उसे उसी दिन रात के 8.30 बजे प्रसारित किया जाता था. मैं वक्त पर उस दिन भी बिड़ला हाउस पहुंच गया. वहां पर प्रार्थना सभा में भाग लेने वालों ने आना चालू कर दिया था.
मैं अपनी रिकॉर्डिंग मशीन को गांधीजी के मंच के पास रख देता था. रोज की तरह सबसे पहले आने वालों में नंदलाल मेहता थे. वे गुजराती थे. कनॉट प्लेस में रहते थे.
साढ़े चार बजे तक प्रार्थना सभा स्थल खचाखच भर गया था. आने वालों में देश से विदेश से, राज्यों से, कोई इंटरव्यू के लिए आ रहा था तो कोई मार्गदर्शन के लिए तो कोई सिर्फ दर्शन करने.
मैंने इस बीच सरदार पटेल को भी बिड़ला हाउस के अंदर जाते देखा. वे बापू से मिलने के लिए आए थे. रोज की भांति जब गांधी प्रार्थना सभा की तरफ़ आ रहे थे तो उन्हें काठियावाड़ से आए दो लोगों ने रोककर मिलने का वक्त का मांगा था. कहते हैं बापू ने जवाब दिया, 'अगर ज़िंदा रहा तो प्रार्थना के बाद उनसे मिलूंगा.'
ये बात मुझे बाद में कुछ लोगों ने बताई थी. उस मनहूस दिन दूसरी या तीसरी बार उन्होंने अपनी मौत की बात की थी.
मुझे वह मंज़र अच्छी तरह से याद है जब नाथूराम गोडसे ने गांधी पर गोलियां चलाईं थीं. जब बिड़ला हाउस के भीतर से गांधी जी प्रार्थना सभा में शामिल होने के लिए निकले तब मेरी घड़ी के हिसाब से 5.16 मिनट का वक्त था.
हालांकि ये कहा जाता है कि 5.17 बजे उन पर गोली चली. आम तौर पर वे 5.10 बजे प्रार्थना के लिए आ जाते थे, लेकिन उस दिन कुछ देर हो गई थी.
उनकी आयु और उनके स्वास्थ्य की वजह से हमेशा उनके कंधे और हाथ मनु और आभा के कंधे पर रहते थे. उस दिन भी उन्हीं के कंधों पर उनका हाथ था. तभी पहली गोली की आवाज आई.
मुझे ऐसा लगा कि दस दिन पहले जो पटाखा चला था वैसा ही हुआ है. मैं उसी एहसास में था कि दूसरी गोली चली. मैं इक्विपमेंट छोड़कर भागा, उस तरफ गया जहां काफी भीड़ थी. तभी तीसरी गोली चली. मैंने अपनी आंखों से देखा.
बाद में पता चला कि गोली मारने वाले का नाम नाथू राम गोडसे था. उसने खाकी कपड़े पहने थे. उसका कद काफी मेरे जैसा ही था. डीलडौल भी मेरे जैसी ही थी. तीसरी गोली चलाने के बाद उसने दोबारा से हाथ जोड़े.
मैंने सुना है पहली गोली चलाते हुए भी हाथ जोड़े थे. उसके बाद लोगों ने उसे पकड़ लिया. उसने किसी भी तरह का विरोध नहीं किया बल्कि अपनी जो रिवॉल्वर थी, उसे भी उनके हवाले कर दिया.
इससे पहले 20 जनवरी, 1948 को भी बिड़ला हाउस में हमला हुआ था. अगले दिन अखबारों में छपा कि मदन लाल पाहवा नाम के शख्स ने पटाखा चलाया था और उसकी ये भी मंशा थी कि गांधीजी को किसी तरीके से चोट पहुंचाई जाए.
उसी दिन प्रार्थना सभा में गांधीजी ने ये कहा कि जिस किसी ने भी ये कोशिश की थी उसे मेरी तरफ से माफ कर दिया जाए.
गांधीजी का ये आदेश था कि कोई भी पुलिस वाला उनकी प्रार्थना सभा में नहीं होगा, लेकिन जब 30 जनवरी को उन पर हमला हुआ तो कुछ लोगों ने पुलिस को इत्तिला दी.

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